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कच्छ: ऐसे दुल्हन ढूंढते हैं लोग

साल 2012 में रचना अवस्थी को यूपी के मिर्जापुर से गुजरात के कच्छ लाया गया। उन्हें नयन बूचिया नाम के शख्स ने अपने बेटे के लिए 50 हजार में खरीदा था। 18 साल की रचना की शादी नयन के बेटे हिरेन से कर दी गई, जो गुजरात के खोखरा गांव में एक किसान था। अभी रचना गुजरात के नए माहौल में ढलने की कोशिश कर ही रही थी कि उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चा होने के एक हफ्ते बाद ही उन्हें किसी दूसरे शख्स को 80 हजार रुपये में बेच दिया गया।

कच्छ में लड़कियां सिर्फ पश्चिम बंगाल या भारत-बंगाल की सीमा से ही नहीं लाई जा रही हैं। रचना जैसी कई लड़कियों की तस्करी उत्तर प्रदेश, असम, बिहार, तमिल नाडु ,आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से की जा रही है। एजेंट इन लड़कियों को 10 हजार से 1 लाख रुपये एक लाख रुपये तक में बेच रहे हैं। लड़कियों का दाम उनकी उम्र और रंग-रूप के मुताबिक तय किया जाता है। इन लड़कियों के बच्चे होते ही इन्हें या तो छोड़ दिया जाता है या फिर ऊंचे दामों में बेच दिया जाता है।

2011 की जनगणना के मुताबिक, कच्छ का लिंगानुपात चिंताजनक है। यहां 1000 लड़कों पर सिर्फ 921 लड़कियां हैं। शहरी इलाकों में तो यह अनुपात और खराब है। गांवों में 1000 लड़कों पर जहां 926 लड़कियां हैं, शहरों में 1000 लड़कों पर सिर्फ 910 लड़कियां।

अगर गांव के किसी लड़के के पास अच्छी-खासी जमीन हो तो भी उसके लिए दुल्हन ढूंढना काफी मुश्किल होता है। इसकी वजह है कि लड़कियां गांवों में नहीं रहना चाहती हैं। नतीजा यह है कि ‘साता’ नामका पुराना रिवाज फिर से चलन में आ गया है। इस रिवाज के मुताबिक, लड़का शादी नहीं कर सकता अगर उसकी कोई बहन नहीं है। अगर उसकी बहन है तो वह उसकी शादी अपनी दुल्हन के भाई से कराता है। यानी लड़कियों की अदला-बदली।

नतीजा यह है कि अमीर परिवारों के लड़के शादी करने के नए तरीके अपना रहे हैं। लड़कियों की खरीद-फरोख्त भी उनमें से एक है। गरीब परिवार के लोग अपनी लड़कियों को पैसे के लिए बेचने को तैयार हो जाते हैं।

‘एकल नारी शक्ति मंच’ (ENSM) की हंसा राठौर ने दावा किया कि 50 लड़कियां यूपी, तमिल नाडु और आंध्र प्रदेश से लाई गई हैं, जैसे ही इनके बच्चे होते हैं इन्हें छोड़ दिया जाता है। राठौर ने बताया,”अकेले खोखरा गांव में तमिलनाडु से 50 लड़कियां लाई गई हैं।” हंसा राठौर शहर में सिंगल विमिन की मीटिंग में हिस्सा लेने अहमदाबाद आई थीं।


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